गजल

सोमवार, मंसिर १५, २०७७
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यलगार करने आ गए हैं सामने के लोग
गफलत में सो रहे हैं मेरे काफ़िले के लोग

अनमोल रत्न तो नहीं अफसोस है मगर
कीमत लगा रहे हैं मिरी दो टके के लोग

दुष्यंत ने कहीं थी ग़ज़ल लोक धर्म की
पीछे पड़े हुए हैं उसी झुनझुने के लोग

तुम हो कि अपना देख के चेहरा चली गई
दीवाने हो गए हैं उसी आइने के लोग

सोचा कि आज घर से चलूं यार की गली
पहरा लगा रहे हैं मगर रास्ते के लोग

मंदिर की बात उनमें न मस्जिद की बात है
कितने ज़हीन हैं ये सभी मयकदे के लोग

मन शाह “नायक”

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